तकनीक से दोस्ती क्यों जरूरी है?
आज का समय तकनीक का समय है। पेमेंट से लेकर बैंकिंग, ऑनलाइन बिल से लेकर मोबाइल ऐप—हर जगह डिजिटल तकनीक हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है। बिना इसे सीखे आज काम चलाना मुश्किल होता जा रहा है।
लेकिन इस तेज़ बदलाव से सबसे ज़्यादा प्रभावित हमारे 60–80 वर्ष के बुजुर्ग हो रहे हैं। पहले जो लोग अपनी मेहनत, समझ और अनुभव से घर चलाते थे, आज अचानक उनके सामने मोबाइल ऐप, ओटीपी, पासवर्ड और इंटरनेट बैंकिंग जैसी नई चुनौतियाँ खड़ी हो गई हैं। तकनीक की इस तेज़ रफ्तार ने उन्हें असहज कर दिया है।
बुजुर्गों की मुख्य समस्याएँ:
बैंकिंग ऐप पूरी तरह अंग्रेज़ी में होना
ओटीपी, पासवर्ड, लॉगिन जैसे शब्द समझ न आना
ऑनलाइन धोखाधड़ी का डर
शाखाओं में स्टाफ की कमी और हर काम के लिए ऐप की सलाह
बच्चों का कम समय देना
तकनीकी तनाव के कारण मानसिक दबाव
इन सबके कारण बुजुर्गों में आत्मविश्वास कम होता जाता है और वे खुद को पीछे छूटा हुआ महसूस करते हैं।
हमें क्या करना चाहिए?
समाज और परिवार दोनों का यह दायित्व है कि बुजुर्गों को तकनीक से जोड़ें, न कि उन्हें अलग-थलग छोड़ दें। संस्कृत में कहा गया है—
\\\\\\\"विद्या विनय देती है और विनय से बुद्धि प्राप्त होती है।\\\\\\\"
इसी तरह धीरे-धीरे नई चीज़ें सीखने से ही आत्मविश्वास बढ़ता है।
कुछ सरल उपाय:
1. सरल भाषा वाले ऐप — सरकार और बैंकों को चाहिए कि हिंदी में आसान ऐप बनाएँ।
2. परिवार समय दे — रोज 1–2 घंटे उनके साथ बैठकर मोबाइल, यूपीआई, वॉट्सऐप आदि सिखाएँ।
3. धैर्य रखें — बुजुर्गों को समय लगता है, इसलिए उन्हें डाँटे नहीं, बार-बार समझाएँ।
4. सुरक्षा सिखाएँ — ओटीपी, पासवर्ड किसी को न बताना, संदिग्ध कॉल से दूर रहना जैसी बातें बार-बार समझाएँ।
5. सामाजिक शिविर — मोहल्ले में डिजिटल प्रशिक्षण शिविर आयोजित हों, जहाँ बुजुर्ग आसानी से सीख सकें।
निष्कर्ष:
तकनीक दुश्मन नहीं बल्कि सहायक है। जरुरी यह है कि हम अपने बुजुर्गों का साथ दें, उन्हें समय दें और धैर्य से तकनीक सिखाएँ। जब घर का हर सदस्य डिजिटल होगा, तभी समाज आगे बढ़ेगा। तकनीक से दूरी नहीं, दोस्ती आज के समय की जरूरत है।