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सोमनाथ मंदिर पर ग़ज़नवी के हमले के 1000 साल: विध्वंस से पुनर्निर्माण तक—आस्था, संघर्ष और सरदार पटेल की ऐतिहासिक भूमिका

नई दिल्ली/सोमनाथ। भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना का प्रतीक माने जाने वाले सोमनाथ मंदिर पर महमूद ग़ज़नवी के हमले को एक हज़ार वर्ष पूरे हो गए हैं। यह मंदिर न केवल अपनी प्राचीनता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि बार-बार हुए विध्वंस और फिर हर बार हुए पुनर्निर्माण की प्रेरक गाथा के कारण भी इतिहास में विशेष स्थान रखता है।

इतिहासकारों के अनुसार, 11वीं शताब्दी में ग़ज़नवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण कर उसे ध्वस्त किया। इसके बाद भी अलग-अलग कालखंडों में कई मुस्लिम शासकों के शासनकाल में इस मंदिर को नुकसान पहुँचाया गया। हालांकि, हर बार भारतीय समाज ने अपनी आस्था और संकल्प के बल पर मंदिर का पुनर्निर्माण किया, जिससे यह संदेश गया कि आस्था को तलवार से मिटाया नहीं जा सकता।

मुग़ल काल से लेकर बाद के वर्षों तक मंदिर का स्वरूप बदलता रहा। कभी इसे आंशिक रूप से तोड़ा गया, कभी इसके धार्मिक स्वरूप को बदलने के प्रयास हुए। बावजूद इसके, सोमनाथ की महिमा और श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई। स्थानीय समाज और संत परंपराओं ने इसे जीवित रखा।

आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर निर्णायक पहल देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने की। उन्होंने इसे केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक माना। सरदार पटेल के नेतृत्व में मंदिर के पुनर्निर्माण का कार्य शुरू हुआ और 1951 में इसका भव्य उद्घाटन हुआ। उस समय राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उद्घाटन कर इसे राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना से जोड़ा।

आज सोमनाथ मंदिर न केवल एक प्रमुख तीर्थ स्थल है, बल्कि भारत की ऐतिहासिक स्मृति, सहनशीलता और पुनर्जन्म की शक्ति का प्रतीक भी है। ग़ज़नवी के हमले के एक हज़ार साल बाद भी यह मंदिर यह संदेश देता है कि विध्वंस क्षणिक होता है, लेकिन आस्था और संस्कृति स्थायी होती हैं।