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थोड़ा मिस कर गए राष्ट्रपति ट्रम्प !

डोनाल्ड ट्रंप को कई वर्षों तक नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की उम्मीद रही है, लेकिन 2025 में भी वह यह सम्मान हासिल नहीं कर पाए, जब यह पुरस्कार वेनेज़ुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो को दिया गया। ट्रंप ने कई बार सार्वजनिक रूप से दावा किया कि वह इस पुरस्कार के हकदार हैं, लेकिन नोबेल समिति ने उनकी कोशिशों को पर्याप्त नहीं माना। 

नोबेल समिति के मानदंडों से मेल न खाना
नोबेल समिति आमतौर पर उन लोगों को पुरस्कार देती है, जो शांति के लिए लंबे समय तक और बहुपक्षीय प्रयास करते हैं। ट्रंप की नीतियां और कूटनीति इस कसौटी पर खरी नहीं उतर पाईं। 

  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कमी: ट्रंप ने अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मंचों से हटा लिया। नोबेल समिति अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने वाले लोगों को प्राथमिकता देती है, जो ट्रंप के कदमों के विपरीत है।
  • अल्पकालिक प्रयास: विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप के कुछ कूटनीतिक प्रयास, जैसे कि गाजा में संघर्ष-विराम समझौता, अल्पकालिक थे। नोबेल समिति संघर्ष के मूल कारणों को हल करने वाले स्थायी प्रयासों को महत्व देती है।
  • पुरस्कार के लिए लॉबिंग: ट्रंप ने कई बार सार्वजनिक रूप से पुरस्कार के लिए लॉबिंग की। समिति ऐसे व्यवहार को हतोत्साहित करती है और अपने फैसले अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत पर आधारित रखती है। 

पुरस्कार के लिए गलत समय
2025 में ट्रंप को पुरस्कार न मिलने का एक कारण समय भी था। 

  • पुरस्कार के ऐलान का समय: नोबेल समिति ने 10 अक्टूबर, 2025 को पुरस्कार का ऐलान किया। जबकि, गाजा में शांति समझौते की घोषणा इसके बाद हुई। इसलिए, समिति ने अपने निर्णय लेते समय इस पर विचार नहीं किया था।
  • नामांकन की समय-सीमा: कुछ रिपोर्टों के अनुसार, 2025 के लिए नामांकन की समय-सीमा 31 जनवरी, 2025 को समाप्त हो गई थी। इसका मतलब है कि ट्रंप के कार्यकाल के दौरान हुए कुछ समझौते उस साल के लिए विचार में नहीं लिए गए होंगे। 

अन्य पहलुओं

  • अन्य उम्मीदवारों की योग्यता: 2025 का पुरस्कार वेनेज़ुएला की लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता मारिया कोरिना मचाडो को उनके अहिंसक संघर्ष के लिए दिया गया। उनकी कोशिशें नोबेल समिति के मानदंडों के अनुकूल मानी गईं।
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना: ट्रंप की कई नीतियों, जैसे कि जलवायु परिवर्तन को नजरअंदाज करना और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का सम्मान न करना, की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना होती रही है। नोबेल समिति ने ऐसे व्यक्ति को पुरस्कार देना उचित नहीं समझा।