उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के भाई रोहित चौधरी के तारापुर से चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद बिहार की राजनीति में परिवारवाद का मुद्दा फिर से गरमाया
तारापुर विधानसभा उपचुनाव: सम्राट चौधरी के भाई के नामांकन से दिलचस्प हुआ मुकाबला
पृष्ठभूमि
बिहार की राजनीति में तारापुर विधानसभा सीट का एक खास स्थान रहा है, खासकर चौधरी परिवार के लिए। यह सीट हमेशा से ही इस परिवार की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र रही है। वर्तमान उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी ने इस सीट का कई बार प्रतिनिधित्व किया है, और उनकी मां पार्वती देवी भी यहां से विधायक रह चुकी हैं। ऐसे में, जब 2025 के उपचुनाव के दौरान सम्राट चौधरी के भाई ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल किया, तो इसने न केवल चौधरी परिवार, बल्कि पूरे चुनाव को दिलचस्प बना दिया।
भाई के नामांकन ने क्यों बढ़ाया रोमांच?
पारिवारिक विरासत: शकुनी चौधरी और उनकी पत्नी पार्वती देवी ने लंबे समय तक तारापुर सीट पर अपना दबदबा बनाए रखा। उनके बेटे सम्राट चौधरी भी बड़े नेता हैं। ऐसे में यह एक तरह से परिवार के भीतर के सियासी मतभेद को उजागर करने वाला कदम है ।
वोटों का बिखराव: सम्राट चौधरी के भाई ने जातीय समीकरणों को प्रभावित करने की संभावना पैदा कर दी। इससे वोटों का बिखराव हो सकता है , जिससे सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) के उम्मीदवार की मुश्किलें बढ़ सकती है ।
भाजपा के लिए दुविधा: सम्राट चौधरी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक वरिष्ठ नेता है , जबकि तारापुर सीट पर जनता दल (यूनाइटेड) का उम्मीदवार था। भाई के निर्दलीय उतरने से भाजपा के लिए एक असहज स्थिति पैदा हो गई है , क्योंकि एक तरफ उन्हें गठबंधन धर्म निभाना था और दूसरी तरफ परिवार का मामला है ।
विपक्षी खेमे में उत्साह: राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेतृत्व में महागठबंधन के लिए यह एक सकारात्मक संकेत है । उन्हें उम्मीद है कि चौधरी परिवार के वोटों के बंटने का सीधा फायदा उन्हें मिलेगा। इससे मुकाबला त्रिकोणीय हो जाएगा , जिसमें सत्ताधारी गठबंधन, विपक्षी गठबंधन और निर्दलीय उम्मीदवार के बीच जोरदार टक्कर देखने को मिलेगी ।
राजनीतिक संदेश: इस नामांकन ने यह संदेश भी दिया कि बिहार में राजनीति अक्सर पारिवारिक संबंधों से ऊपर उठकर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित होती है। यह दिखाता है कि मजबूत राजनीतिक परिवारों में भी सीट और टिकट को लेकर सहमति बनाना हमेशा संभव नहीं होता।
सम्राट चौधरी के भाई के निर्दलीय नामांकन ने तारापुर उपचुनाव को एक साधारण चुनाव से कहीं अधिक दिलचस्प बना दिया है । यह घटना दिखाती है कि पारिवारिक वर्चस्व वाले क्षेत्रों में भी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और राजनीतिक दांव-पेंच कैसे चुनाव की दिशा बदल सकते हैं।