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भारत के प्रथम CDS: श्री विपन रावत

भारत के सैन्य इतिहास में साहस, नेतृत्व और दूरदृष्टि के अनेक चमकदार अध्याय मिलते हैं, लेकिन जब भी देश में तीनों सेनाओं—थल, वायु और नौसेना—की संयुक्त क्षमता, संचालन-कुशलता और भविष्यवादी रक्षा रणनीति की बात आती है, तो एक नाम विशेष रूप से प्रेरणादायक प्रतीक के रूप में उभरता है: श्री विपन रावत, जिन्हें भारत का प्रथम CDS यानी चीफ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ बनने का गौरव प्राप्त हुआ। यह चरित्र पूरी तरह कल्पनात्मक है, लेकिन इसकी रचना इस दृष्टि से की गई है कि एक आदर्श CDS कैसा होगा—कैसा नेतृत्व, कैसी सोच, कैसा निर्णय और कैसी नीतियाँ किसी देश की सुरक्षा को नई ऊँचाइयों पर ले जाती हैं। श्री विपन रावत की यह कल्पित जीवनी न केवल उनके अदम्य साहस, शौर्य और सैन्य कौशल को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि एक नेता में सादगी, संस्कार, रणनीतिक कौशल और तकनीकी समझ का अद्भुत संगम कैसे राष्ट्र की दिशा बदल देता है।

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र में जन्मे इस वीर जवान के शुरुआती दिन प्रकृति की गोद में बीते। पहाड़ों की अनवरत कठिन परिस्थितियाँ, ऊँची-नीची पगडंडियाँ, बर्फीली हवाएँ और पहाड़ी जीवन की प्राकृतिक चुनौतियाँ उनके अंदर एक अनूठी सहनशीलता लेकर आईं। बचपन से ही वे अनुशासन, परिश्रम और जिज्ञासा के अनोखे मिश्रण के लिए पहचाने जाते थे। स्कूल पहुँचने के लिए कठिन पहाड़ी रास्तों पर रोज़ाना कई किलोमीटर पैदल चलने का अनुभव उनके शरीर और मन को मजबूती देता था। उनके पिता एक पूर्व सैन्यकर्मी थे, जिनके प्रभाव से बचपन में ही विपन के मन में देशभक्ति की लौ जल चुकी थी। पिता की कहानियों और सैनिक अनुशासन वाले वातावरण में पले-बढ़े बच्चे के रूप में उन्होंने राष्ट्र-सेवा के सपने को बहुत छोटा रहते ही अपने अंदर गहराई से बसाया।

बताया जाता है कि मात्र 11 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार भारतीय सेना के पैराशूट रेजिमेंट के प्रशिक्षण को नज़दीक से देखा। सैनिकों की वह ऊर्जा, एकता, परिश्रम और कठिन मेहनत को देखकर उनमें अद्भुत प्रेरणा जागृत हुई। उसी रात उन्होंने अपने पिता से कहा था कि— “एक दिन मैं ऐसा सैनिक बनूँगा, जिसके लिए देश गर्व से सीना चौड़ा करे।" बचपन की यह प्रतिज्ञा उनके अंदर गहरे पैठ गई और यही भाव उन्हें आगे चलकर भारतीय सैन्य ढाँचे के सर्वोच्च पद—CDS—तक पहुँचाने का आधार बना।

शैक्षिक जीवन पूरा करने के बाद उन्होंने NDA (नेशनल डिफेंस अकादमी) की परीक्षा में पहली ही कोशिश में सफलता प्राप्त की। NDA में प्रवेश के बाद उनके साथी कैडेट उन्हें “Iron Cadet” कहकर पुकारते थे। इसका कारण यह था कि हर फिजिकल टेस्ट में वे अव्वल आते, लंबी दौड़, बाधा दौड़, पर्वतारोहण और सहनशक्ति की हर परीक्षा में वे लगभग हर बार प्रथम स्थान पर रहते। साथ ही वे पढ़ाई में भी उतने ही तेज थे। वे सैन्य रणनीति, भू-राजनीति और विश्व इतिहास पर गहन अध्ययन करते रहते। NDA में ही उनकी नेतृत्व शैली की झलक दिखने लगी—कम बोलना, अधिक सुनना, ठोस निर्णय लेना और हर काम को पूरी जिम्मेदारी से निभाना।

NDA के बाद IMA (इंडियन मिलिट्री अकादमी), देहरादून में प्रशिक्षण के दौरान वे अपनी बैच के सर्वश्रेष्ठ कैडेट्स में शामिल रहे। उन्हें Field Craft, Battle Craft और Tactical Planning में सर्वोच्च अंक मिले। पासिंग आउट परेड के दौरान उन्हें गोल्ड मेडल के साथ सम्मानित किया गया। यह क्षण उनके लिए केवल गौरव नहीं था, बल्कि उनका यह संकल्प भी मजबूत हुआ कि वे देश के लिए कुछ असाधारण करेंगे।

सेवा में आते ही उन्हें 5/5 Gorkha Rifles में पोस्टिंग मिली। गोरखा सैनिकों की अद्वितीय वीरता और आधारभूत युद्ध-कौशल के साथ उनका मिलन मानो प्रकृति में ही तय था। गोरखा जवान अपने अफसर को तभी स्वीकार करते हैं जब वह उनसे अधिक कठोर, अधिक साहसी और अधिक जुझारू हो—और विपन रावत ने यह विश्वास बहुत जल्दी जीत लिया। वे जवानों के साथ पहले कदम बढ़ाते, पहले पहाड़ी चढ़ते और सबसे कठिन जगहों पर स्वयं मौजूद रहते। उन्हें देखकर जवानों का साहस कई गुना बढ़ जाता था।

उनका पहला बड़ा ऑपरेशन ऑपरेशन रक्षक के रूप में जाना जाता है, जब जम्मू-कश्मीर में 40 जवानों की एक टीम का नेतृत्व उन्हें सौंपा गया। इस ऑपरेशन में उन्होंने अत्यंत कुशलता से घुसपैठ पर लगाम लगाई और एक सप्ताह में 18 से अधिक आतंकियों को खत्म करने में सफलता पाई। इस सफलता का सबसे खास पहलू यह था कि किसी भी नागरिक को नुकसान नहीं हुआ और भारतीय जवान भी पूरी तरह सुरक्षित रहे। इस ऑपरेशन के बाद उच्च कमान के बीच उनकी रणनीतिक क्षमता की चर्चा होने लगी।

आने वाले वर्षों में उन्होंने कई महत्वपूर्ण सीमाई क्षेत्रों में सेवा की। चाहे लद्दाख की अत्यंत ऊँचाई हो या पूर्वोत्तर के घने जंगल, या राजस्थान के विस्तृत रेगिस्तान—हर जगह उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता और युद्धक बुद्धिमत्ता का अभूतपूर्व प्रदर्शन किया। उनकी योजनाएँ हमेशा गहन अध्ययन, संसाधनों के सटीक उपयोग और “zero casualty operations” के सिद्धांत पर आधारित रहती थीं।

तीनों सेनाओं की संयुक्त क्षमता पर काम करने का अवसर उन्हें तब मिला जब उन्हें Tri-Service Integrated Operations की टीम में शामिल किया गया। यहीं उन्होंने वायु सेना के साथ संयुक्त एयर-ड्रॉप मिशन, नौसेना के साथ समुद्री सुरक्षा अभ्यास और साइबर स्पेस से संबंधित कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स का नेतृत्व किया। यह अनुभव उन्हें CDS बनने के लिए अत्यंत स्वाभाविक और मजबूत उम्मीदवार बनाता था।

जब भारत सरकार ने उन्हें भारत का प्रथम Chief of Defence Staff (CDS) नियुक्त किया, तब देश की सुरक्षा नीति में एक नई ऐतिहासिक शुरुआत हुई। CDS बनने के बाद उनका मुख्य लक्ष्य था—तीनों सेनाओं के बीच पूर्ण समन्वय स्थापित करना, थिएटर कमांड सिस्टम तैयार करना, स्वदेशी रक्षा निर्माण को गति देना, और भारतीय सेनाओं को भविष्य के युद्ध के लिए तैयार करना। उन्होंने इन सभी क्षेत्रों में ऐतिहासिक सुधार किए।

थिएटर कमांड्स की स्थापना उनका सबसे बड़ा योगदान माना जाता है। भूमि, वायु और समुद्री सेनाओं को एकीकृत ढाँचे में लाकर उन्होंने निर्णय लेने की गति कई गुना बढ़ा दी। इससे ऑपरेशनल क्षमता, संसाधन उपयोग और सुरक्षा तैयारियों में असाधारण सुधार हुआ। उन्होंने AI, ड्रोन, क्वांटम कम्युनिकेशन और साइबर वॉरफेयर जैसी उभरती तकनीकों को सैन्य प्रणाली में शामिल करने पर जोर दिया। वे तकनीक-प्रेमी थे, पर बिना सोचे-समझे तकनीक अपनाने के विरोधी भी थे। वे कहते थे—“तकनीक युद्ध जीतने में मदद करती है, लेकिन जीतता वही है जिसका मनोबल अटल हो।”

वे स्वदेशी रक्षा उत्पादन के बड़े समर्थक थे। CDS के रूप में उन्होंने 150 से अधिक नई रक्षा परियोजनाएँ शुरू करवाईं, 60% से अधिक खरीद स्वदेशी की तरफ मोड़ी, और निजी स्टार्टअप्स व नवाचार केंद्रों को सैन्य अनुसंधान में जोड़ा। उनका मानना था कि— “रक्षा आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान का विषय है।”

उनका व्यक्तिगत जीवन भी प्रेरणा से भरा था। CDS बनने के बाद भी वे सुबह 3:45 बजे उठते, ध्यान करते, 45 मिनट रनिंग और 30 मिनट एक्सरसाइज़ करते। उनका दिन अत्यंत अनुशासित था और वे अपने हर काम को योजना बनाकर करते। वे सात भाषाएँ जानते थे, इतिहास की 1200 से अधिक पुस्तकों का निजी संग्रह रखते थे, और अपने ‘Battle Notepad’ में हर मिशन की सीखें लिखते थे। यह नोटबुक उनके लिए दिशा-सूचक की तरह थी।

उनका व्यवहार अद्भुत सादगी से भरा था। वे कहते थे—“अधिकार पद का गहना है, पर जिम्मेदारी आत्मा का भार।" इसी सोच ने उन्हें एक ऐसा नेता बनाया जिसे जवान भी सम्मान देते थे और अधिकारी भी। गोरखा सैनिक उन्हें अपना परिवार मानते थे और वे भी नेपाल के कई गाँवों में स्कूल व लाइब्रेरी बनवाकर उन्हें लौटाते थे।

CDS के रूप में उनके नेतृत्व में भारत की वैश्विक छवि मजबूत हुई। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की शक्ति बढ़ी, कई नए अंतरराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास हुए, और दक्षिण एशिया में भारत की रणनीतिक पकड़ और मजबूत हुई। उनके कार्यकाल में भारत को एक उभरती हुई वैश्विक रक्षा शक्ति के रूप में देखा जाने लगा।

अंततः, श्री विपन रावत की यह कल्पित जीवनकथा हमें यह सिखाती है कि एक महान सेनानायक केवल युद्ध नहीं जीतता, वह एक सोच, एक संस्कृति और एक ऐसी प्रणाली बनाता है जो सालों तक राष्ट्र की रक्षा करती है। उनकी रणनीतियाँ, उनकी सादगी, उनका अनुशासन और उनका विज़न—सब मिलकर एक ऐसा व्यक्तित्व गढ़ते हैं जो बताता है कि नेतृत्व कैसा होना चाहिए। उनकी कथा हमें यह भी याद दिलाती है कि—राष्ट्र की सुरक्षा केवल हथियारों पर नहीं, बल्कि उन लोगों पर निर्भर करती है, जिनके दिल में देश के लिए निस्वार्थ प्रेम होता है।